भारत लगातार 77 वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यू.एन.एस.सी.) का स्थाई सदस्य बनने का कर रहा प्रयास, चीन ने लगाया अड़ंगा :

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यू.एन.एस.सी. का नियम है कि पांचों स्थायी स्दस्य देशों में से अगर कोई भी किसी विषय पर आपत्ति जताता है तो वह बिल संयुक्त राष्ट्र में पास नहीं होगा।

फ्रांस, अमरीका और रूस ने कई बार भारत का समर्थन किया, लेकिन चीन किसी भी कीमत पर भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य के रूप में नहीं देखना चाहता। वह एशिया से यू.एन.एस.सी. का एकमात्र सदस्य है और अकेला ही रहना चाहता है।

लगता है अब चीन के दिन लद गए, क्योंकि इस बार रूस ने खुलकर भारत और ब्राजील का समर्थन किया है। रूस चाहता है कि संयुक्त राष्ट्र की समय अनुरूप प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए नए सदस्यों को जोड़ा जाना बहुत जरूरी है, नहीं तो संयुक्त राष्ट्र पश्चिमी देशों का प्रोपेगंडा मात्र रह जाएगा। इस बारे में हाल ही में चीन की राजधानी पेइचिंग में रूसी राजदूत एन्द्रेई देनिसोव ने कहा था कि यू.एन.एस.सी. में अब विस्तार किया जाए और स्थाई सदस्यता बढ़ाई जाए, जिसमें रूस भारत और ब्राजील का समर्थन करेगा। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के जानकारों की राय में रूस कभी भी जर्मनी और जापान को संयुक्त राष्ट्र में शामिल नहीं होने देगा, क्योंकि रूस के मुताबिक इससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का रक्षा संतुलन बिगड़ जाएगा।

पेइचिंग में गत दिवस यूनाइटेड नेशन्स वल्र्ड फोरम का प्लैनरी सैशन में रूस के राजदूत एन्द्रेई देनिसोव ने अमरीका, ब्रिटेन और फ्रांस पर आरोप लगाया कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद एक ऐसी जगह बन गया है जहां पर पश्चिमी देश अपना प्रोपेगंडा चलाते हैं और अपनी बात को शाश्वत सत्य के रूप में दुनिया के सामने दिखाते हैं। यही वजह है कि अब संयुक्त राष्ट्र को एक बार पुनरावलोकन करने और इसका विस्तार कर इसमें नए देशों को जगह देने की जरूरत है।

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रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के संयोजन को बदलने के पक्ष में है। दरअसल जर्मनी और जापान पूरी तरह से अमरीकी पक्ष में हैं और इनके यू.एन.एस.सी. का स्थायी सदस्य बनने से सिर्फ अमरीका और पश्चिमी देशों का पक्ष मजबूत होगा और पश्चिमी शक्तियां यू.एन.एस.सी. के जरिए अपना प्रोपेगंडा फैलाने और अपनी बात को सही दिखाने में अधिक सक्षम होंगी। देनिसोव ने कहा कि जर्मनी और जापान को यू.एन.एस.सी. में शामिल करने से इसका अंदरूनी संतुलन और बिगड़ेगा।

दरअसल रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यू.एन.एस.सी. में रूस अकेला पड़ गया है और पश्चिमी देश संयुक्त राष्ट्र के माध्यम से अपनी अलग कहानी दुनिया के सामने रख रहे हैं। रूस का यह मानना है कि भारत कभी भी अपनी आंखें बंद कर अमरीका को समर्थन नहीं देगा, जबकि जर्मनी और जापान दोनों अमरीका का आंखें मूंदकर समर्थन करेंगे। जापान तो सैन्य सुरक्षा के लिहाज से आज भी अमरीका पर निर्भर है। चीन से अपनी सुरक्षा को लेकर जापान के पास एक छोटी सेना भी है लेकिन वह चीन का मुकाबला नहीं कर सकती, इसलिए जापान हमेशा अमरीका के पाले में रहेगा। वहीं जर्मनी भी अपने शक्ति संतुलन को बरकरार रखने के लिए यूरोपीय संघ की आर्थिक महाशक्ति बने रहने के लिए अमरीका को किसी भी हालत में नाराज नहीं करेगा।

पेइचिंग में देनिसोव ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का संयोजन बदलने के लिए अफ्रीका, लैटिन अमरीका और एशियाई देशों को शामिल करना होगा, ताकि इनके रुख से भी दुनिया परिचित हो और इनकी आवाज को भी वैश्विक स्तर पर सुना जाए। इन देशों को शामिल करने से संयुक्त राष्ट्र में आंतरिक संतुलन मजबूत होगा और सभी पक्षों की बात सुनी जाएगी।

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नए देशों को यू.एन.एस.सी. में शामिल करने से उसे बदलते समय में प्रासंगिक बनाने के लिए मदद मिलेगी और यू.एन.एस.सी. ज्यादा लोकतांत्रिक होगा। भले ही यू.एन.एस.सी. में भारत को स्थाई तौर पर शामिल किए जाने को लेकर फ्रांस, ब्रिटेन और अमरीका द्वारा समय-समय पर समर्थन मिलता रहा है, लेकिन भारत के यू.एन.एस.सी. में शामिल होने की राह में चीन एक बड़ी अड़चन है जिससे निपट पाना फिलहाल यू.एन.एस.सी. के नियमों के तहत मुश्किल काम है।

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